गणेश चतुर्थी व्रत कथा और गणपति अष्टोत्तर शतनामावली

गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। यह भगवान गणेश की आराधना का प्रमुख पर्व है। इस दिन भक्त गणपति की स्थापना करते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं, व्रत रखते हैं और गणेश चतुर्थी की व्रत कथा का श्रवण करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान गणेश विघ्नों को दूर करने वाले, बुद्धि-विवेक प्रदान करने वाले और शुभ कार्यों के अधिष्ठाता हैं।

इस लेख में गणेश चतुर्थी व्रत का महत्व, चंद्र दर्शन से जुड़े मिथ्या कलंक की कथा, श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि का प्रसंग, भगवान गणेश के प्राकट्य की प्रसिद्ध कथा, संक्षिप्त पूजा विधि और श्रीसिद्धिविनायक अष्टोत्तर शतनामावली के 108 नाम अर्थ सहित दिए गए हैं।

गणेश चतुर्थी व्रत का महत्व

भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य, पूजा, यज्ञ या नए कार्य के आरंभ से पहले गणेश जी का स्मरण करने की परंपरा है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का व्रत गणपति की कृपा प्राप्त करने और विघ्नों से मुक्ति की कामना से किया जाता है।

इस दिन गणेश जी की पूजा, व्रत कथा का श्रवण और नामावली का पाठ श्रद्धा के साथ किया जाता है। विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों में पूजा-विधि तथा कथा के विवरण में कुछ अंतर मिल सकता है।

गणेश चतुर्थी की व्रत कथा

गणेश चतुर्थी की प्रसिद्ध व्रत कथा का संबंध भगवान चंद्रमा और मिथ्या कलंक से है। धार्मिक परंपरा में माना जाता है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन करने से मिथ्या आरोप या कलंक लगने का दोष हो सकता है।

कथा के अनुसार एक बार भगवान गणेश अपने मूषक वाहन पर सवार होकर जा रहे थे। उनके उदर पर अनेक मोदक थे। मार्ग में मूषक को सर्प दिखाई दिया और वह घबरा गया। उसके कारण गणेश जी का संतुलन बिगड़ा और वे भूमि पर गिर पड़े। चंद्रदेव ने यह दृश्य देखा और गणेश जी के रूप पर हंस पड़े।

चंद्रमा के इस उपहास से गणेश जी अप्रसन्न हुए और उन्होंने चंद्रदेव को शाप दिया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन जो व्यक्ति चंद्रमा के दर्शन करेगा, उसे मिथ्या कलंक या झूठे आरोप का सामना करना पड़ सकता है।

चंद्रदेव और देवताओं ने गणेश जी से क्षमा मांगी। गणेश जी ने प्रसन्न होकर शाप को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, बल्कि उसके प्रभाव को सीमित किया। परंपरागत कथा के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन से मिथ्या दोष उत्पन्न हो सकता है, जबकि शुक्ल द्वितीया के चंद्र दर्शन को इस दोष से बचाव से जोड़ा गया है।

इसी कारण गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन से बचने की परंपरा है।

श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि का प्रसंग

गणेश चतुर्थी की व्रत कथा में भगवान श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि का प्रसंग विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण पर स्यमंतक मणि को चुराने और उससे जुड़े व्यक्ति की हत्या करने का झूठा आरोप लगा। अपनी निर्दोषता सिद्ध करने के लिए श्रीकृष्ण उस मणि की खोज में निकले। खोज करते हुए वे जाम्बवान की गुफा तक पहुंचे। वहां स्यमंतक मणि जाम्बवान के पास थी।

श्रीकृष्ण और जाम्बवान के बीच लंबे समय तक युद्ध हुआ। अंततः जाम्बवान ने श्रीकृष्ण को पहचान लिया और उन्हें भगवान विष्णु का अवतार तथा श्रीराम के रूप में पहचाना। उन्होंने स्यमंतक मणि श्रीकृष्ण को सौंप दी और अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया।

श्रीकृष्ण द्वारका लौटे और स्यमंतक मणि की पूरी घटना बताकर अपनी निर्दोषता सिद्ध की। बाद में देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन के कारण उन्हें मिथ्या कलंक का सामना करना पड़ा था।

नारद जी के निर्देश पर श्रीकृष्ण ने गणेश चतुर्थी का व्रत और गणेश पूजा की। इसके बाद उनका मिथ्या दोष दूर हुआ। इसी कथा के कारण गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन से बचने की परंपरा और इस दिन व्रत कथा सुनने की महत्ता बताई जाती है।

यदि भूलवश गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन हो जाए, तो परंपरा में स्यमंतक मणि से संबंधित मंत्र का पाठ करने तथा गणेश जी की पूजा और कथा-श्रवण करने का उल्लेख मिलता है:

सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः।

सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥

भगवान गणेश के प्राकट्य की कथा

भगवान गणेश के प्राकट्य की एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार माता पार्वती ने स्नान करने से पहले अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसमें प्राणों का संचार किया। उन्होंने उस बालक को द्वार पर पहरा देने के लिए नियुक्त किया और आदेश दिया कि उनकी अनुमति के बिना किसी को भीतर प्रवेश न करने दिया जाए।

उसी समय भगवान शिव वहां पहुंचे और भीतर जाने लगे। बालक ने माता पार्वती की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें रोक दिया। इस पर शिव जी और बालक के बीच संघर्ष हुआ और भगवान शिव ने क्रोध में बालक का सिर अलग कर दिया।

जब माता पार्वती को यह ज्ञात हुआ तो वे अत्यंत क्रोधित और दुखी हुईं। देवताओं ने स्थिति को शांत करने का प्रयास किया। भगवान शिव ने बालक को पुनर्जीवित करने के लिए हाथी का सिर उसके धड़ पर स्थापित किया और उसमें पुनः प्राणों का संचार किया।

इस प्रकार वह बालक गजानन कहलाया। भगवान शिव ने उन्हें गणों का अधिपति बनाया और उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया। इसी कारण वे गणपति, गणेश, गजानन और विघ्नहर्ता जैसे अनेक नामों से पूजे जाते हैं।

गणेश चतुर्थी की संक्षिप्त पूजा विधि

गणेश चतुर्थी के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और श्रद्धापूर्वक व्रत का संकल्प लें। शुभ समय में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।

पूजा में परंपरा के अनुसार जल, अक्षत, रोली, चंदन, पुष्प, दूर्वा, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं। भगवान गणेश को मोदक तथा अन्य नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं।

इसके बाद गणेश जी का ध्यान करके गणपति अष्टोत्तर शतनामावली, गणेश चालीसा अथवा अन्य गणेश स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है। गणेश चतुर्थी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें और अंत में गणेश जी की आरती करें।

पूजा-विधि में क्षेत्र, परिवार और संप्रदाय के अनुसार अंतर हो सकता है, इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय पूजा-विधि का पालन करना उचित है।

श्रीसिद्धिविनायक अष्टोत्तर शतनामावली

अष्टोत्तर शतनामावली में भगवान गणेश के 108 नामों का स्मरण किया जाता है। नीचे श्रीसिद्धिविनायक नामावली की एक पारंपरिक पाठ-परंपरा दी गई है। प्रत्येक नाम के साथ “ॐ” और “नमः” का प्रयोग किया जाता है।

भगवान गणेश के 108 नाम और उनके अर्थ

  1. ॐ विनायकाय नमः — सभी कार्यों के मार्गदर्शक और विघ्नों को दूर करने वाले।
  2. ॐ विघ्नराजाय नमः — विघ्नों के अधिपति।
  3. ॐ गौरीपुत्राय नमः — माता गौरी के पुत्र।
  4. ॐ गणेश्वराय नमः — गणों के ईश्वर।
  5. ॐ स्कन्दाग्रजाय नमः — भगवान स्कन्द के बड़े भाई।
  6. ॐ अव्ययाय नमः — अविनाशी और अक्षय स्वरूप।
  7. ॐ पूताय नमः — पवित्र एवं निर्मल स्वरूप।
  8. ॐ दक्षाध्यक्ष्याय नमः — दक्षों के अध्यक्ष एवं अधिपति।
  9. ॐ द्विजप्रियाय नमः — द्विजों और विद्वानों के प्रिय।
  10. ॐ अग्निगर्भच्छिदे नमः — अग्नि के गर्भ या तेज को भेदने वाले।
  11. ॐ इन्द्रश्रीप्रदाय नमः — इंद्र को श्री और वैभव प्रदान करने वाले।
  12. ॐ वाणीबलप्रदाय नमः — वाणी और सामर्थ्य प्रदान करने वाले।
  13. ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः — सभी सिद्धियां प्रदान करने वाले।
  14. ॐ शर्वतनयाय नमः — भगवान शिव के पुत्र।
  15. ॐ गौरीतनूजाय नमः — माता गौरी के पुत्र।
  16. ॐ शर्वरीप्रियाय नमः — माता पार्वती के प्रिय।
  17. ॐ सर्वात्मकाय नमः — समस्त प्राणियों में आत्मरूप से स्थित।
  18. ॐ सृष्टिकर्त्रे नमः — सृष्टि की रचना करने वाले।
  19. ॐ देवोऽनेकार्चिताय नमः — अनेक देवताओं द्वारा पूजित।
  20. ॐ शिवाय नमः — कल्याणकारी स्वरूप।
  21. ॐ शुद्धाय नमः — शुद्ध और निर्मल।
  22. ॐ बुद्धिप्रियाय नमः — बुद्धि के प्रिय।
  23. ॐ शान्ताय नमः — शांत स्वरूप।
  24. ॐ ब्रह्मचारिणे नमः — ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले।
  25. ॐ गजाननाय नमः — हाथी के मुख वाले।
  26. ॐ द्वैमातुराय नमः — दो माताओं से संबंधित।
  27. ॐ मुनिस्तुत्याय नमः — मुनियों द्वारा स्तुत।
  28. ॐ भक्तविघ्नविनाशनाय नमः — भक्तों के विघ्नों का नाश करने वाले।
  29. ॐ एकदन्ताय नमः — एक दंत वाले।
  30. ॐ चतुर्बाहवे नमः — चार भुजाओं वाले।
  31. ॐ शक्तिसंयुताय नमः — शक्ति से युक्त।
  32. ॐ चतुराय नमः — चतुर और कुशल।
  33. ॐ लम्बोदराय नमः — विशाल उदर वाले।
  34. ॐ शूर्पकर्णाय नमः — सूप के समान बड़े कानों वाले।
  35. ॐ हेरम्बाय नमः — भक्तों के रक्षक और करुणामय गणेश।
  36. ॐ ब्रह्मवित्तमाय नमः — ब्रह्म के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ।
  37. ॐ कालाय नमः — कालस्वरूप।
  38. ॐ ग्रहपतये नमः — ग्रहों के अधिपति।
  39. ॐ कामिने नमः — इच्छाओं को पूर्ण करने वाले।
  40. ॐ सोमसूर्याग्निलोचनाय नमः — चंद्र, सूर्य और अग्नि के समान नेत्र वाले।
  41. ॐ पाशाङ्कुशधराय नमः — पाश और अंकुश धारण करने वाले।
  42. ॐ छन्दाय नमः — आनंदमय और प्रसन्न स्वरूप।
  43. ॐ गुणातीताय नमः — तीनों गुणों से परे।
  44. ॐ निरञ्जनाय नमः — निष्कलंक और निर्मल।
  45. ॐ अकल्मषाय नमः — पाप और दोष से रहित।
  46. ॐ स्वयंसिद्धार्चितपदाय नमः — जिनके चरणों की सिद्ध पुरुष पूजा करते हैं।
  47. ॐ बीजापूरकराय नमः — बीजपूर फल धारण करने वाले।
  48. ॐ अव्यक्ताय नमः — अव्यक्त और सूक्ष्म स्वरूप।
  49. ॐ गदिने नमः — गदा धारण करने वाले।
  50. ॐ वरदाय नमः — वर प्रदान करने वाले।
  51. ॐ शाश्वताय नमः — सनातन और शाश्वत।
  52. ॐ कृतिने नमः — कुशल और कर्मनिपुण।
  53. ॐ विद्वत्प्रियाय नमः — विद्वानों के प्रिय।
  54. ॐ वीतभयाय नमः — भय से रहित करने वाले।
  55. ॐ चक्रिणे नमः — चक्र धारण करने वाले।
  56. ॐ इक्षुचापधृते नमः — गन्ने का धनुष धारण करने वाले।
  57. ॐ अब्जोत्पलकराय नमः — कमल और उत्पल धारण करने वाले।
  58. ॐ श्रीधाय नमः — श्री और समृद्धि धारण करने वाले।
  59. ॐ श्रीहेतवे नमः — श्री और मंगल के कारण।
  60. ॐ स्तुतिहर्षताय नमः — स्तुति से प्रसन्न होने वाले।
  61. ॐ कलाद्भृते नमः — कलाओं को धारण करने वाले।
  62. ॐ जटिने नमः — जटाधारी।
  63. ॐ चन्द्रचूडाय नमः — मस्तक पर चंद्र धारण करने वाले।
  64. ॐ अमरेश्वराय नमः — देवताओं के ईश्वर।
  65. ॐ नागयज्ञोपवीतिने नमः — नाग को यज्ञोपवीत के रूप में धारण करने वाले।
  66. ॐ श्रीकान्ताय नमः — सुंदर और शोभायुक्त स्वरूप वाले।
  67. ॐ रामार्चितपदाय नमः — जिनके चरणों की श्रीराम ने पूजा की।
  68. ॐ वृतिने नमः — संयम और सदाचार से युक्त।
  69. ॐ स्थूलकान्ताय नमः — स्थूल और प्रभावशाली स्वरूप वाले।
  70. ॐ त्रयीकर्त्रे नमः — तीनों वेदों के कर्ता और ज्ञाता।
  71. ॐ सङ्घोषप्रियाय नमः — सामवेदिक एवं मंगलमय घोष के प्रिय।
  72. ॐ पुरुषोत्तमाय नमः — पुरुषों में श्रेष्ठ।
  73. ॐ स्थूलतुण्डाय नमः — विशाल सूंड वाले।
  74. ॐ अग्रजन्याय नमः — अग्रणी और श्रेष्ठ।
  75. ॐ ग्रामण्ये नमः — समूहों और समुदायों के मार्गदर्शक।
  76. ॐ गणपाय नमः — गणों के अधिपति।
  77. ॐ स्थिराय नमः — स्थिर और अचल।
  78. ॐ वृद्धिदाय नमः — वृद्धि और उन्नति प्रदान करने वाले।
  79. ॐ सुभगाय नमः — सुंदर और सौभाग्यशाली स्वरूप।
  80. ॐ शूराय नमः — वीर और पराक्रमी।
  81. ॐ वागीशाय नमः — वाणी के स्वामी।
  82. ॐ सिद्धिदाय नमः — सिद्धि प्रदान करने वाले।
  83. ॐ दूर्वाबिल्वप्रियाय नमः — दूर्वा और बिल्वपत्र के प्रिय।
  84. ॐ कान्ताय नमः — मनोहर और आकर्षक स्वरूप।
  85. ॐ पापहारिणे नमः — पापों और दोषों को हरने वाले।
  86. ॐ कृतागमाय नमः — शास्त्रों और आगमों के ज्ञाता।
  87. ॐ समाहिताय नमः — एकाग्र और ध्यानस्थ।
  88. ॐ वक्रतुण्डाय नमः — वक्र सूंड वाले।
  89. ॐ श्रीप्रदाय नमः — श्री और समृद्धि प्रदान करने वाले।
  90. ॐ सौम्याय नमः — शांत और सौम्य स्वरूप।
  91. ॐ भक्ताकाङ्क्षितदाय नमः — भक्तों की इच्छाएं पूर्ण करने वाले।
  92. ॐ अच्युताय नमः — अचल और अविनाशी।
  93. ॐ केवलाय नमः — अद्वितीय और परम स्वरूप।
  94. ॐ सिद्धाय नमः — सिद्ध और पूर्ण स्वरूप।
  95. ॐ सच्चिदानन्दविग्रहाय नमः — सत्, चित् और आनंद के स्वरूप।
  96. ॐ ज्ञानिने नमः — ज्ञानस्वरूप और परम ज्ञानी।
  97. ॐ मायायुक्ताय नमः — माया के अधीश्वर।
  98. ॐ दन्ताय नमः — दंतधारी और एकदंत स्वरूप।
  99. ॐ ब्रह्मिष्ठाय नमः — ब्रह्म में स्थित और ब्रह्मनिष्ठ।
  100. ॐ भयावर्चिताय नमः — भयभीतों द्वारा शरण लिए जाने वाले।
  101. ॐ प्रमत्तदैत्यभयदाय नमः — उग्र दैत्यों को भी भय प्रदान करने वाले।
  102. ॐ व्यक्तमूर्तये नमः — प्रकट और साकार स्वरूप।
  103. ॐ अमूर्तये नमः — निराकार और सूक्ष्म स्वरूप।
  104. ॐ पार्वतीशङ्करोत्सङ्गखेलनोत्सवलालनाय नमः — माता पार्वती और भगवान शंकर की गोद में आनंदपूर्वक क्रीड़ा करने वाले।
  105. ॐ समस्तजगदाधाराय नमः — समस्त जगत के आधार।
  106. ॐ वरमूषकवाहनाय नमः — श्रेष्ठ मूषक को वाहन बनाने वाले।
  107. ॐ हृष्टस्तुताय नमः — स्तुति से प्रसन्न होने वाले।
  108. ॐ प्रसन्नात्मने नमः — प्रसन्न और निर्मल आत्मस्वरूप।

फलश्रुति और समापन

गणेश चतुर्थी श्रद्धा, भक्ति और मंगलकामना का पर्व है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा, व्रत कथा का श्रवण और उनके 108 नामों का स्मरण भक्तिभाव से किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार गणपति की आराधना से विघ्नों का नाश, बुद्धि-विवेक की प्राप्ति और शुभ कार्यों में सफलता की कामना की जाती है।

गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया।

टिप्पणी: गणेश चतुर्थी की कथा, पूजा-विधि और अष्टोत्तर शतनामावली के पाठ में विभिन्न ग्रंथों, क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार कुछ पाठांतर मिल सकते हैं। इस लेख में कथा को सरल और भक्तिपरक रूप में प्रस्तुत किया गया है तथा 108 नामों के लिए श्रीसिद्धिविनायक नामावली की एक पारंपरिक पाठ-परंपरा का अनुसरण किया गया है।

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